Aghori Sadhus : अघोरी चंचलनाथ जितनी खूबसूरत उतने रहस्य :- प्रयागराज (Prayagraj) में बीते साल महाकुंभ (Mahakumbh) में एक रहस्यमयी अघोरी साध्वी सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहीं। यह साध्वी न सिर्फ अपनी अलौकिक शक्तियों के लिए, बल्कि अपनी सुंदरता और दीप्तिमान चेहरे के लिए भी चर्चा में रहती हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इन साध्वी का नाम चंचल नाथ है। हाल ही में उन्हें ताजमहल में प्रवेश करने से रोक दिया गया। मंडे मोटिवेशन में जानते हैं महिला अघोरी साधु चंचलनाथ की कहानी। यह भी जानते हैं कि चंचलनाथ जैसी महिला नागा साधु बनने के लिए क्या परीक्षा देनी पड़ती है।
वह बिना माचिस के हवन कुंड में लगाती हैं आग
रिपोर्ट्स में अघोरी साध्वी चंचल नाथ अपनी सिद्धियों के लिए प्रसिद्ध हो रही हैं। ऐसा दावा किया जाता है कि वह बिना किसी बाहरी साधन के हवन कुंड में आग जला सकती हैं। वह न तो माचिस का इस्तेमाल करती हैं और न ही किसी अन्य ज्वलनशील वस्तु का, फिर भी उनके हाथों के स्पर्श मात्र से अग्नि प्रकट हो जाती है।
तुलसी के पत्तों का पानी पीने के फायदे
इस नजारे को देखने के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। साध्वी न सिर्फ़ अपने हाथों से आग जलाना जानती हैं, बल्कि हवा में नींबू उड़ाना भी जानती हैं। लोग उनके चमत्कारों से दंग रह जाते हैं। वह इंस्टाग्राम, एक्स और यू-टयूब वगैरह पर काफी वायरल रहती हैं।
7 साल की उम्र में ही कर दिया था यह काम
अघोरी साध्वी चंचल नाथ का जीवन उनके चमत्कारों की तरह ही रहस्यमयी है। कहा जाता है कि वे मूल रूप से बंगाल की रहने वाली हैं और 7 साल की उम्र में ही वह घर छोड़कर साधना पथ पर चल पड़ी थीं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 7 साल की उम्र में ही उन्हें परिवार द्वारा कुल गुरु को समर्पित कर दिया गया।
यहीं से उनके अघोर मार्ग की शुरुआत हुई। 12-13 साल तक बंगाल में रहकर उन्होंने गुरु से तांत्रिक क्रियाएं, मंत्र सिद्धि और अघोर विद्या सीखी। वर्षों की कठोर तपस्या के बाद उन्हें दिव्य शक्तियां प्राप्त हुईं। वर्तमान में, वे हरियाणा के करनाल में घरौंडा स्थित महाकाली मंदिर में रहकर मां काली की आराधना करती हैं।
क्या आशीर्वाद से किस्मत बदलती है?
भक्तों का मानना है कि साध्वी चंचल नाथ (Aghori Chanchalnath ) का आशीर्वाद लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव लाता है। कई भक्तों का कहना है कि उनके दर्शन मात्र से ही सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।
साध्वी के चेहरे पर दिव्यता और तेज झलकता है, जिससे वे सहज ही लोगों को आकर्षित कर लेती हैं। महाकुंभ में उमड़ी भीड़ और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो से साफ है कि अघोरी साध्वी चंचल नाथ का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। उनकी रहस्यमयी शक्तियां और अलौकिक व्यक्तित्व लोगों के बीच आज तक कौतूहल का विषय बना हुआ है।
आगरा का ताज देखे बिना लौट गईं
रिपोर्ट्स के अनुसार, अघोरी साध्वी चंचलनाथ (Aghori Chanchalnath ) हाल ही में ताजमहल देखने के देखने लिए आगरा आईं। उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू था। वे ताजमहल के पूर्वी द्वार से प्रवेश ले रही थीं। गेट पर तैनात सीआईएसएफ ने उन्हें बाहर ही रोक दिया।
आपत्ति जताते हुए उन्हें त्रिशूल और डमरू को बाहर ही रखने के लिए कहा गया। इस पर वह तैयार हो गईं, लेकिन अपने साथ एक बर्तन लेकर जाना चाहती थीं, जिसमें वह भोजन करती हैं। जब उन्हें बर्तन छोड़कर अंदर जाने को कहा गया तो वह नाराज होकर लौट गईं।
नागिन कहलाती हैं महिला नागा साधु
धनंजय चोपड़ा की किताब ‘भारत में कुंभ’ के अनुसार, महिला नागा साधु ‘नागिन’, ‘अवधूतिनी,’ ‘माई’ कहलाती हैं। ये पुरुष नागा साधुओं के उलट वस्त्रधारी होती हैं।. सबसे ज्यादा ‘माई’ जूना अखाड़ा में हैं, जहां इनकी संख्या हजारों में है।
वहीं, निरंजनी जैसे दूसरे अखाड़ों में भी महिला साधु हैं, लेकिन इनकी संख्या कम है. जूना अखाड़ा ने सन् 2013 को माई बाड़ा को दशनामी संन्यासियों के अखाड़े का स्वरूप प्रदान कर दिया। इनका शिविर जूना अखाड़े शिविर के पास लगाया जाता है। ‘माई’ या ‘अवधूतनियों’ को अखाड़े में ‘श्रीमहंत’ का पद दिया जाता है. ‘श्रीमहंत’ के पद पर चुनी गई महिला साधु शाही स्नान के दिन पालकी में चलती हैं और उन्हें अखाड़े का ध्वज, डंका लगाने की अनुमति होती है।
कैसे बनती हैं नागिन या अवधूतिनी
किताब के अनुसार, महिलाओं के नागा संन्यासी बनने की बेहद जटिल प्रक्रिया है। नागा संन्यासी बनने का निर्णय लेने वाली महिला के घर-परिवार और सांसारिक जीवन की गहन जांच-पड़ताल होती है. महिला को यह प्रमाणित करना होता है कि उसे मोह-माया से अब कोई लगाव नहीं है और वह ब्रह्मचर्य का पालन करने का संकल्प ले चुकी है।
वह जिस आश्रम या अखाड़े में रहती है, उसे 10 से 15 साल तक यह साबित करने में लग जाता है कि वह अब माया-मोह से ऊपर उठ चुकी है। इसके बाद ही गुरु उसे दीक्षा देते हें। दीक्षा प्राप्त करने के बाद महिला संन्यासी को सांसारिक वस्त्र त्याग कर अखाड़े से मिले एक पीले वस्त्र से संन्यासिनों की तरह अपने तन को ढकना होता है।
ऐसी होती है नागा साधुओं की लाइफ
किताब के अनुसार, नागा साधुओं को अपना मुंडन, पिंडदान जैसे संस्कार करने होते हैं। इसके बाद उन्हें गुरु की ओर से भभूत, वस्त्र और कंठी प्रदान की जाती है। पिंडदान के बाद उन्हें दंड-कमंडल प्रदान किया जाता है। इसके बाद महिला नागा संन्यासिन पूरा दिन जप करती हैं। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में शिव जी का जप और उसके बाद अखाड़े के इष्टदेव की पूजा करती हैं। इसके बाद अखाड़े में उसे नागा संन्यासिन मान लिया जाता है और ‘माता’ की पदवी देकर उसका सम्मान किया जाता है।
नागा साध्वी को इसका ताउम्र पालन करना पड़ता है
नागा साध्वी को एक ही वस्त्र लपेट कर रहना होता है। नदी स्नान या शाही स्नान भी वे वस्त्र लपेट कर ही करती हैं। उन्हें एक ही वक्त भोजन करना होता है। वह भी कंद-मूल और फल खाकर जीवन गुजारना पड़ता है। इसके अलावा, जमीन पर सोना पड़ता है।
