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Home » UttarakhandPolitics : सुबोध उनियाल होना आसान नहीं – उमेश कुमार
उत्तराखंड

UttarakhandPolitics : सुबोध उनियाल होना आसान नहीं – उमेश कुमार

Courtesy: MLA Umesh Kumar's social media post.
Narad PostBy Narad PostJune 12, 2026No Comments4 Mins Read
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UttarakhandPolitics
UttarakhandPolitics : सुबोध उनियाल होना आसान नहीं - उमेश कुमार
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UttarakhandPolitics : सुबोध उनियाल होना आसान नहीं – उमेश कुमार :-  आजकल राजनीति में एक नया चलन चल पड़ा है। किसी लोकप्रिय व्यक्ति को घेरो, कैमरा ऑन करो, उसे उकसाओ, फिर उसकी प्रतिक्रिया को पूरे घटनाक्रम का केंद्र बनाकर प्रस्तुत कर दो। इससे कुछ समय के लिए सुर्खियाँ तो मिल जाती हैं, लेकिन सच्चाई अक्सर पीछे छूट जाती है।

यदि किसी मंत्री, विधायक या जनप्रतिनिधि से कोई गलती हुई है तो उसके लिए कानून है, आचार संहिता है, चुनाव आयोग है और न्यायिक व्यवस्था भी है। कार्रवाई होनी चाहिए, निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और यदि दोष साबित हो तो सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति को जानबूझकर उकसाकर उससे प्रतिक्रिया लेने की कोशिश करना लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रदर्शन अधिक लगता है।

सुबोध उनियाल उत्तराखंड की राजनीति के उन गिने-चुने नेताओं में हैं जो आज भी आम आदमी के लिए सुलभ हैं। सचिवालय हो, विधानसभा हो, उनका कार्यालय हो या उनका निजी आवास—लोग बिना किसी बड़े तामझाम के उनसे मिलने पहुंच जाते हैं। उत्तरकाशी से लेकर चकराता, टिहरी से लेकर हरिद्वार तक हजारों लोग ऐसे मिल जाएंगे जो यह कहेंगे कि उन्होंने उनके काम के लिए कभी दरवाजा बंद नहीं पाया।

हाँ, यह भी सच है कि उनका स्वभाव कभी-कभी तल्ख दिखाई देता है। लेकिन यह भी समझना होगा कि वर्षों से लगातार जनता के बीच रहना, हजारों लोगों की समस्याएं सुनना, विभागों की जिम्मेदारियां संभालना और राजनीतिक दबावों के बीच काम करना कोई आसान बात नहीं है।

कई बार अत्यधिक कार्यभार और तनाव व्यक्ति के व्यवहार में कठोरता ला देता है। यह मानवीय स्वभाव है, कोई असाधारण बात नहीं।लेकिन किसी एक क्षण की प्रतिक्रिया के आधार पर पूरे व्यक्ति का मूल्यांकन कर देना भी न्यायसंगत नहीं है। किसी नेता को समझना है तो उसके दशकों के सार्वजनिक जीवन को देखना चाहिए, उसके काम को देखना चाहिए, उसके आचरण के इतिहास को देखना चाहिए।

बात सन 2008 की है, सुबोध उनियाल जी को अचानक बहुत गंभीर बीमारी हो गई और वो सीएमआई अस्पताल के आईसीयू में एडमिट थे। कुछ दिन बाद उन्हें रूम में शिफ्ट किया किया गया । इस दौरान मैं लगभग एक सप्ताह सुबोध भाई के साथ दिन-रात रहा। एक दिन उन्हें नीचे CT स्कैन करने ले जाया जा रहा था तो अचानक उन्होंने स्ट्रेचर पर एक व्यक्ति को देखा तो रुक गए और गढ़वाली में उसके साथ जा रही महिला से बात करने लगे, बात सुनने के तत्काल बाद उन्होंने मुझसे अस्पताल के मालिक डॉक्टर जैन को फ़ोन मिलवाया और उन्हें कहा कि ये मेरे परिचित है इनको ठीक से देखना है और इलाज पर जो खर्च आएगा मैं दूँगा।

एक व्यक्ति ख़ुद आईसीयू में गंभीर बीमारी से जूझ रहा है लेकिन तब भी अस्पताल में जाते क्षेत्र के परिचित के लिए चिंतित हो जाता है। आज सुबोध उनियाल को सब इसलिए गरियाने लगे है क्योंकि वो एक मंत्री है अन्यथा तो कोई पूछने वाला भी नहीं था।

सुबोध उनियाल के राजनीतिक जीवन पर नजर डालिए। विरोधी भी शायद ही उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर कोई गंभीर आरोप लगा पाएं। उत्तराखंड की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बावजूद उनकी पहचान एक काम करने वाले मंत्री की रही है।

यही कारण है कि आज भी उनकी लोकप्रियता बनी हुई है। लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है, विरोध करना भी जरूरी है। लेकिन विरोध और उकसावे में फर्क होता है। किसी की लोकप्रियता का सहारा लेकर खुद की पहचान बनाने की राजनीति अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन समाज और लोकतंत्र को मजबूत नहीं करती।

आलोचना होनी चाहिए, जवाबदेही भी होनी चाहिए, लेकिन निष्पक्षता भी होनी चाहिए। किसी एक वीडियो, एक क्लिप या एक क्षण को पूरी कहानी बना देना उचित नहीं है।

क्योंकि सच यही है कि मंत्री बनना आसान हो सकता है, लेकिन वर्षों तक जनता के बीच रहकर उनकी उम्मीदों का बोझ उठाना आसान नहीं होता। और यही कारण है कि हर कोई सुबोध उनियाल नहीं बन सकता। (यह लेखक के निजी विचार हैं )

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