PatrioticMovies : ओटीटी और फिल्मों में क्यों हिट है देशभक्ति फार्मूला ? :- दुश्मन देशों पर भारत की जीत को पर्दे पर उतारना केवल युद्ध के दृश्य फिल्माना नहीं, बल्कि उन सैनिकों के साहस, अनुशासन और जज्बातों को ईमानदारी से जीने की कोशिश होती है। फिल्म गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल में फ्लाइट कमांडर ऑफिसर बने अभिनेता विनीत कुमार सिंह कहते हैं, “गुंजन सक्सेना ने कारगिल युद्ध में जिस इलाके से घायल सैनिकों को रेस्क्यू किया था, वहीं हम शूट कर रहे थे।
मैं यूनिफॉर्म में था, हेलीकॉप्टर का पंखा जब चलना शुरू हुआ और निर्देशक ने एक्शन बोला, वह अहसास ही अलग था। शूटिंग के दौरान महसूस हो रहा था कि यह सब सच में हुआ है। असली युद्ध क्षेत्र बार-बार रीशूट की कोई गुंजाइश नहीं होती, क्योंकि जीवन दांव पर होता है।
जब भी बड़े पर्दे पर बॉर्डर या एलओसी
कारगिल या युद्ध पर आधारित दूसरी फिल्में आती हैं, तो वे सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि देशभक्ति का जज्बा जगाती हैं और वीर जवानों के साहस व बलिदान पर गर्व करने का अवसर भी देती हैं। निर्देशक जेपी दत्ता मानते हैं कि युद्ध नायकों की कहानियां बार-बार पर्दे पर आनी चाहिए, क्योंकि ऐसी फिल्में नई पीढ़ी में राष्ट्र प्रेम और देश सेवा की भावना को मजबूत करती हैं।
उन्होंने कहा था कि युद्ध के नायकों पर जितनी भी फिल्में बनाई जा सकती हैं, बननी चाहिए। लोगों को समझना चाहिए कि जीत हमेशा एक कीमत पर मिलती है।
जवान हमारे परिवारों की रक्षा के लिए अपने परिवारों को पीछे छोड़ देते हैं। फिल्में दर्शकों को प्रभावित करती हैं। उनके माध्यम से देशभक्ति को बढ़ाने, लोगों को सेना में शामिल होने या देश सेवा के लिए प्रेरित कर पाते हैं, तो मुझे लगता है कि मैंने भी अपना योगदान दिया है।
वर्दी पहनते ही जाग उठता है देशभक्ति का जज्बा
युद्ध की कहानियां सिर्फ गोलियों और रणभूमि की नहीं होतीं, बल्कि उन जज्बातों की होती हैं, जिनकी बदौलत तिरंगा शान से लहराता है। जब कोई कलाकार सैन्य वर्दी पहनकर किसी युद्ध नायक का किरदार निभाता है, तो वह केवल अभिनय नहीं करता, बल्कि देशभक्ति, कर्तव्य और विजय की उस भावना को भी जीता है, जिसे हमारे सैनिक वास्तविक युद्धभूमि में हर दिन जीते हैं।
द टेस्ट केस और कोड एम जैसे सैन्य-आधारित प्रोजेक्ट्स के निर्माता समर खान भी मानते हैं कि किसी भी कलाकार का सपना सैन्य वर्दी का रोल करना होता है।
दरअसल, वर्दी पहनते ही देश के प्रति वो जज्बा अपने आप ही जग जाता है। उसका फिल्मांकन करते समय आप उस इमोशन को महसूस कर पाते हैं, क्योंकि आप उस क्षण को जी रहे होते हैं। आप अपने दुश्मन को मार रहे होते हैं। आप देश की जीत के लिए दिलोजान से मिशन में जुटे होते हैं।
जब हम उस सीक्वेंस को शूट कर रहे होते हैं, तो यह हमारा हिस्सा बन जाते हैं। जब आप तिरंगे को सलाम कर रहे होते हैं तो अपने आप आपको उस पर गर्व होता है। देशभक्ति का भाव जग जाता है। यह अहसास वहां मौजूद लोगों और स्क्रीन पर देख रहे दर्शकों को भी होने लगता है।
