AI ; अब ‘सुनकर’ मासूस कराएगा एम्स का एआई स्मार्ट ग्लासेस :- तकनीक के जरिये दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए एम्स ने 53 नेत्रहीन और गंभीर दृष्टिबाधित लोगों को एआई आधारित स्मार्ट विज़न ग्लासेस वितरित किए. ये खास चश्मे आसपास के दृश्य को ध्वनि में बदल देते हैं, जिससे यूज करने वाले अपने आसपास की दुनिया को “सुन” सकते हैं।
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यह डिवाइस प्रिंटेड टेक्स्ट पढ़कर सुनाने, वस्तुओं की पहचान करने, चेहरों को पहचानने, रास्ते में आने वाली बाधाओं को बताने और नेविगेशन में मदद करने में सक्षम है. चलिए आपको बताते हैं कि ये कैसे काम करता है और इससे न देखपाने वाले लोगों को क्या फायदा होगा।
रोजमर्रा की जिंदगी को बनाता है आसान
रियल-टाइम ऑब्जेक्ट रिकग्निशन और टेक्स्ट-टू-स्पीच तकनीक से लैस यह चश्मा रोजमर्रा के काम आसान बनाता है, चाहे दवाइयों के लेबल पढ़ना हो, नोट पहचानना हो या दरवाजे का रास्ता ढूंढना. लाभार्थियों में अमर कॉलोनी स्थित एक ब्लाइंड स्कूल के 28 बच्चे और डॉ. आरपी सेंटर, एम्स से जुड़े 25 एडल्ट शामिल थे. इनमें लो-विजन और रिहैबिलिटेशन क्लिनिक के वे मरीज भी थे, जिन्हें अपूरणीय दृष्टिहानि है।
क्या कहना है एक्सपर्ट का?
करीब 35,000 रुपये कीमत वाला यह उपकरण ‘प्रोजेक्ट दृष्टि’ के तहत निःशुल्क उपलब्ध कराया गया. यह पहल रोटरी, विजन एड और अन्य सहयोगियों के समर्थन से चलाई जा रही है. एम्स के कम्युनिटी ऑप्थैल्मोलॉजी विभाग से जुड़े डॉ. प्रवीण वशिष्ठ के अनुसार, इस पहल को एक संरचित रिसर्च परियोजना के रूप में लागू किया जा रहा है।
लाभार्थियों का एक वर्ष तक हर महीने फॉलो-अप किया जाएगा, ताकि उनकी लाइफ क्वालिटी में आए बदलाव का आकलन किया जा सके. स्टडी के नतीजों को दस्तावेजित कर प्रकाशित भी किया जाएगा. जिससे आगे इसपर काम हो सके।
भारत में एक बड़ी समस्या
भारत में लगभग एक करोड़ लोग अंधत्व या गंभीर अंधापन से जूझ रहे हैं. जहां कई मामलों का इलाज संभव है, वहीं कुछ मरीज एडवांस ग्लूकोमा, डायबिटिक रेटिनोपैथी, एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजेनेरेशन या ऑप्टिक नर्व डैमेज जैसी स्थितियों से पीड़ित होते हैं, जिनमें सर्जरी समाधान नहीं होती. ऐसे में पुनर्वास ही स्वतंत्र जीवन की राह बनता है।
एसएचजी टेक्नोलॉजीज़ द्वारा विकसित ये स्मार्ट ग्लासेस अब अपने पांचवें संस्करण में हैं. पहले के मॉडल अपेक्षाकृत भारी और बटन-आधारित थे, जबकि नया एडिशन हल्का, सेंसर-आधारित और अधिक उन्नत एआई क्षमताओं से लैस है. एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसी एआई आधारित सहायक तकनीक क्लिनिकल इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि उसका मजबूत पूरक है, जो दृष्टिहीन लोगों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में नई ताकत देती है।
