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Home » PassiveEuthanasia : इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया कैसे करते हैं डॉक्टर ?
दिल्ली

PassiveEuthanasia : इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया कैसे करते हैं डॉक्टर ?

What happens when life support systems are removed?
Narad PostBy Narad PostMarch 19, 2026No Comments4 Mins Read
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PassiveEuthanasia
PassiveEuthanasia : इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया कैसे करते हैं डॉक्टर ?
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PassiveEuthanasia : इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया कैसे करते हैं डॉक्टर ? :-  सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के युवक हरीश राणा की स्थिति को देखते हुए उसे निष्क्रिय इच्छा मृत्यु देने की अभिभावकों की गुहार सुन ली जिसके बाद दिल्ली एम्स ने इस प्रक्रिया को शुरू किया लेकिन क्या आपको मालूम है कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु की चिकित्सीय प्रक्रिया क्या होती है या सक्रिय इच्छा मृत्यु से कितनी अलग होती है. दोनों में डॉक्टर की क्या भूमिका है. भारत में किस तरह की इच्छा मृत्यु को कानूनी मंजूरी मिली हुई है, प्रक्रिया क्या है. क्या ये काम इंजेक्शन लगाकर होता है या किसी और ढंग से. आइये आपको जानकारी देते हैं।

ये प्रक्रिया कितनी दर्दनाक या शांतिदायक है

एम्स में डॉक्टरों का पैनल स्थिति जांचेगा. पुष्टि करेगा कि ठीक होने की कोई संभावना नहीं. फीडिंग ट्यूब, ऑक्सीजन या अन्य कृत्रिम सपोर्ट हटाने का आकलन किया जाएगा. इसमें परिवार की सहमति जरूरी होगी. मंजूरी के बाद धीरे-धीरे जीवन-रक्षक उपचार बंद किए जाएंगे. दर्द निवारक दवाएं और आरामदायक देखभाल दी जाएगी, ताकि पीड़ा न हो।

लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम हटाने पर क्या होता है

लाइफ सपोर्टिंग सिस्टम हटाने पर रोगी के शरीर पर कृत्रिम सहायता के बिना प्राकृतिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिससे धीरे-धीरे मृत्यु हो जाती है. यह निष्क्रिय इच्छामृत्यु का हिस्सा है, जिसमें कोई दर्द नहीं होता।
जीवनरक्षक उपकरण जैसे फीडिंग ट्यूब, वेंटिलेटर या ऑक्सीजन सपोर्ट हटाने पर रोगी का शरीर पहले निर्जलीकरण और भुखमरी की स्थिति में चला जाता है. सांस लेने की क्षमता कम होने पर हृदय गति धीमी पड़ती है. ऑक्सीजन की कमी से कोमा गहरा हो जाता है. आमतौर पर कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक समय लगता है।
पहले गैर-जरूरी पाइप हटाए जाते हैं, फिर मुख्य सपोर्ट – हरीश राणा के मामले में AIIMS में दो पाइप पहले हटा चुके हैं. पैलिएटिव केयर में दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं ताकि पीड़ा न हो. डॉक्टर स्थिति पर नजर रखते हैं और अगला कदम मरीज की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है. यह सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत मेडिकल बोर्ड की मंजूरी से होता है, जिसमें गरिमापूर्ण मृत्यु सुनिश्चित की जाती है।

एक्टिव इच्छा मृत्यु कैसे होती है

दुनिया के उन देशों में, जहां ये कानूनी है, बहुत ही शांत और दर्द रहित तरीके से की जाती है. इसका मुख्य उद्देश्य ही व्यक्ति को असहनीय कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है, इसलिए इसमें दर्द की कोई गुंजाइश नहीं रखी जाती. आमतौर पर डॉक्टर इसे दो चरणों में पूरा करते हैं।

पहले देते हैं बेहोशी की दवा

सबसे पहले मरीज को एक बहुत ही शक्तिशाली एनेस्थीसिया या ‘सेडेटिव’ दिया जाता है. यह अक्सर नस के जरिए दिया जाता है. इससे व्यक्ति कुछ ही सेकंडों में बहुत गहरी नींद में चला जाता है. ये ऐसी स्थिति होती है जबकि व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसके शरीर के साथ क्या हो रहा है. उसे कोई फीलिंग नहीं होती. शरीर में होने वाली किसी भी हलचल का अहसास नहीं होता।

फिर देते हैं मुख्य दवा

जब डॉक्टरों को ये अंदाज हो जाता है कि मरीज पूरी तरह से अचेत हो चुका है, बहुत गहरी बेहोशी में है, अब उसको किसी भी चीज का पता नहीं चल रहा है, तब वो दूसरी दवा देते हैं. ये दवा शरीर की मांसपेशियों, खासकर श्वसन प्रणाली और हृदय को धीरे-धीरे काम करने से रोक देती है. ये दवा शरीर के तंत्रिका तंत्र और मांसपेशियों के बीच के संपर्क को पूरी तरह काट देती है. क्योंकि मरीज पहले से ही गहरी नींद में होता है, उसे सांस रुकने या दिल की धड़कन थमने का बिल्कुल पता नहीं चलता।
ये दवा इंजेक्शन के जरिए ही दी जाती है ताकि इसका असर जल्दी और ज्यादा असरदार है. बेहोशी के बाद जो दूसरी दवा दी जाती है, उसे चिकित्सा की भाषा में ‘न्यूरोमस्कुलर ब्लॉकिंग एजेंट’ कहा जाता है. इसमें अक्सर ‘पैनकुरोनियम ब्रोमाइड’ या ‘वेकुरोनियम’ जैसी दवाओं का उपयोग होता है।

शरीर में कैसे क्या होता है

जैसे ही यह दूसरी दवा नस के जरिए शरीर में प्रवेश करती है, ये काम होने लगता है मांसपेशियों का शिथिल होना – सबसे पहले शरीर की सभी स्वैच्छिक मांसपेशियां काम करना बंद कर देती हैं. व्यक्ति हिल-डुल नहीं सकता, लेकिन क्योंकि वह पहले से ही गहरी बेहोशी में होता है, उसे इस जकड़न या लकवे का अहसास नहीं होता।
श्वसन प्रणाली का रुकना – ये इस प्रक्रिया का सबसे मुख्य हिस्सा है. यह दवा ‘डायाफ्राम’ को शिथिल कर देती है, जो सांस लेने के लिए जिम्मेदार मुख्य मांसपेशी है. इसके रुकते ही फेफड़े हवा खींचना बंद कर देते हैं।
हृदय गति का रुकना – जब फेफड़े काम करना बंद कर देते हैं, तो रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा तेजी से गिरने लगती है. ऑक्सीजन की कमी के कारण हृदय की मांसपेशियां धड़कना बंद कर देती हैं।
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