ChandniChowkHistory : किला-ए-मुबारक. को हम लाल किले के नाम से जानते हैं :- दिल्ली अगर दिल वालों की है तो दिल्ली का दिल है चांदनी चौक. इसी चांदनी चौक के सामने स्थित लाल किले के पास कार में धमाका कर दिल्ली के दिल को घायल कर दिया गया. वह चांदनी चौक जो मुगलों के समय से आज तक दिल्ली ही नहीं, पूरे देश के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है. पर क्या आप जानते हैं कि इस चांदनी चौक को एक मुगल शहजादी ने डिजाइन किया था? इसका नाम कैसे पड़ा? इस बाजार के बीच में एक नहर बहती थी, उसका क्या हुआ? आइए इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं।
दिलवालों की दिल्ली, खासकर पुरानी दिल्ली वैसे तो मुगल काल के ढेरों नायाब चीजों को अपने में समेटे है. इसलिए घूमने-फिरने के शौकीनों के लिए दिल्ली एक मुफीद शहर है. यहां के बाजारों में खरीदारी के भी ढेरों विकल्प हैं. इसलिए देश भर से लोग दिल्ली के बाजारों में खरीदारी करने आते हैं. विदेशी पर्यटक भी यहां खरीदारी का लोभ नहीं संभाल पाते।
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दिल्ली के इन्हीं बाजारों में से एक है चांदनी चौक. राष्ट्रीय राजधानी के मशहूर बाजारों में से एक चांदनी चौक खासतौर पर शादी-ब्याह हो या फिर कोई अन्य समारोह, दिल्ली जाने वाले चांदनी चौक से ही खरीदारी करना पसंद करते हैं. इलेक्ट्रॉनिक सामानों के लिए भी यह बाजार काफी मशहूर है।
सबसे खास बात यह है कि यह बाजार आज से नहीं, मुगलों के समय से मशहूर है. दरअसल, सभी महिलाओं की तरह मुगल बादशाह शाहजहां की बेटी जहांआरा को भी खरीदारी का काफी शौक था. इसीलिए साल 1648 में जब शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली स्थानांतरित की तो इस बाजार का निर्माण कराने के बारे में सोचा था।
यह साल 1638 की बात है, जब शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली ले जाने की योजना बनाई. इसके लिए दिल्ली में एक नया शहर बसाया गया शाहजहानाबाद. इसी शहर को आज हम पुरानी दिल्ली के नाम से जानते हैं. साल 1638 में शाहजहानाबाद बसना शुरू हुआ और साल 1648 में बस कर तैयार हुआ. यहीं पर शाहजहां ने किला बनवाया, जिसका नाम रखा किला-ए-मुबारक. इसी किले को आज हम लाल किले के नाम से जानते हैं।
जहांआरा ने तैयार किया था बाजार का डिजाइन
दिल्ली के किले में शाही परिवार रहने आया तो शाहजहां की बेटी जहांआरा अक्सर खरीदारी के लिए अलग-अलग बाजारों में जाने लगी. बताया जाता है कि जहांआरा को खरीदारी का काफी शौक था. इसको देखते हुए शाहजहां ने अपनी बेटी के लिए लाल किले के ही सामने एक खास और बड़ा बाजार बनवाने की योजना बनाई।
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बादशाह की इस योजना के बारे में जहांआरा को पता चला तो उसने अपने खरीदारी के शौक को पूरा करने के लिए खुद इस बाजार का डिजाइन तैयार किया. इसके बाद 1650 के दशक में यह बाजार शाही किले के ठीक सामने बनाया गया और इसकी शुरुआत हुई. इतिहासकारों की मानें तो शुरुआत में यह बाजार 40 गज चौड़ा था।
इसकी लंबाई 1520 गज थी. इस बाजार में तब कुल 1560 दुकानें थीं, जो अपने आप में एक अच्छी-खासी संख्या है. इस बाजार में तब भी जरूरत के सभी सामान एक ही जगह मिल जाते थे।
जहांआरा के डिजाइन किए गए बाजार का नाम चांदनी चौक क्यों पड़ा, इसकी भी दिलचस्प कहानी है. वास्तव में जब इस बाजार को मुगलों ने बनवाया तो इसका यह अर्ध-चंद्राकार यानी कि आधे चांद के जैसा था।
इतना ही नहीं, इस बाजार में बीच से एक नहर बहती थी और एक तालाब भी था. इस शाही नहर और तालाब को यमुना नदी से पानी की आपूर्ति की जाती थी. चांदनी रात में जब चांद की दूधिया रोशनी इस नहर और तालाब पर पड़ती थी, तो पूरा बाजार जगमगा उठता था. इसी के कारण इस बाजार का नाम ही चांदनी चौक पड़ गया।
