दहेज की बलि चढ़ रही महिलाएं : – ग्रेटर नोएडा की निक्की का मामला सिर्फ एक अकेली घटना नहीं है. यह उन हजारों दर्दनाक कहानियों में से एक है जो हर साल दहेज की आग में दबकर खत्म हो जाती हैं. जब उसके आरोपी पति ने बेशर्मी से कहा, “वह खुद मरी,” तो यह केवल एक बयान नहीं था, बल्कि एक ऐसी मानसिकता का प्रतिबिंब था जो सदियों से हमारे समाज को खोखला कर रही है. निक्की जैसी कितनी ही लड़कियां आज भी दहेज के लोभियों की बलि चढ़ रही हैं. सरकारी आंकड़े भी यही कहानी दोहराते हैं, जो बताते हैं कि यह एक-दो दिन की नहीं, बल्कि हर दिन कई बेटियां दहेज के लिए दम तोड़ रही हैं।
दहेज की बलि चढ़ रही महिलाएं
ग्रेटर नोएडा की 26 साल की निक्की अकेली नहीं है, जिसे दहेज के लिए मार दिया गया हो. निक्की जैसी हजारों लड़कियों को हर साल दहेज के लिए मार दिया जाता है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के दहेज हत्या को लेकर 2022 तक के ही आंकड़े मौजूद हैं. आंकड़ों से पता चलता है कि 5 साल में दहेज हत्या में कमी जरूर आई है लेकिन अब भी हजारों महिलाओं को मार दिया जाता है. NCRB के आंकड़ों के मुताबिक, 2018 की तुलना में 2022 में दहेज हत्या के मामलों में 10% की कमी आई है।
क्या कहते हैं NCRB के आंकड़े?
साल 2018 में 7,277 दहेज हत्या
साल 2019 में 7,162 दहेज हत्या
साल 2020 में 7,045 दहेज हत्या
साल 2021 में 6,795 दहेज हत्या
साल 2022 में 6,516 दहेज हत्या
हर दिन 18 महिलाओं की हत्या
2018 में दहेज के लिए 7,277 महिलाओं की हत्या कर दी गई थी. 2022 में दहेज की मांग के चलते 6,516 महिलाओं को मार दिया गया. इस हिसाब से हर दिन औसतन 18 महिलाओं की हत्या दहेज के लिए कर दी गई. यह आंकड़े बताते हैं कि दहेज की समस्या अभी भी हमारे समाज में बहुत गहरी है.
कुप्रथा का शिकार होती महिलाएं
दहेज हत्या के ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं, लेकिन यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक सामाजिक त्रासदी है. निक्की का मामला हमें याद दिलाता है कि भले ही कानून सख्त हो गए हों, लेकिन जब तक दहेज की मानसिकता खत्म नहीं होगी, तब तक निक्की जैसी और भी लड़कियां इस कुप्रथा का शिकार होती रहेंगी. हमें यह समझना होगा कि यह केवल पुलिस और कानून की लड़ाई नहीं है, बल्कि एक सामाजिक लड़ाई है, जिसे जीतने के लिए हर व्यक्ति को आगे आना होगा।
