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Home » AllahabadHCLiveInRight : ‘पसंद के साथी के साथ रहना मौलिक अधिकार
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AllahabadHCLiveInRight : ‘पसंद के साथी के साथ रहना मौलिक अधिकार

'Simply because the petitioners are living in an inter-religious relationship.
Narad PostBy Narad PostMarch 6, 2026No Comments3 Mins Read
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AllahabadHCLiveInRight
AllahabadHCLiveInRight : ‘पसंद के साथी के साथ रहना मौलिक अधिकार
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AllahabadHCLiveInRight : ‘पसंद के साथी के साथ रहना मौलिक अधिकार :- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहीं महिलाओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि अलग-अलग धर्मों के दो वयस्कों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप ‘यूपी विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021’ के तहत अपराध नहीं है. इन जोड़ों ने धमकियां मिलने के बाद कोर्ट में याचिका लगाते हुए पुलिस सुरक्षा की मांग की है. कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कानून के तहत अंतरधार्मिक विवाह करने से रोका भी नहीं जा सकता।

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इन 12 याचिकाओं में से सात मामले हिंदू पुरुषों के साथ रहने वाली मुस्लिम महिलाओं के थे, बाकी में मुस्लिम पुरुषों के साथ रहने वाली हिंदू महिलाएं शामिल थीं. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि उन्हें दूसरे समुदाय के साथी के साथ रिश्ते में होने की वजह से धमकियां मिल रही हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि कोर्ट याचिकाकर्ताओं को धर्म के चश्मे से नहीं देख रही है. वह उन्हें उन वयस्कों के रूप में देख रही है, शांति से साथ रहना चाहते हैं. बेंच ने टिप्पणी की, ‘यह कोर्ट यह नहीं समझ पा रही, कि जब कानून दो व्यक्तियों को, यहां तक कि समान लिंग के लोगों को भी, शांतिपूर्वक साथ रहने की अनुमति देता है, तो किसी व्यक्ति, परिवार या यहां तक कि राज्य को भी दो वयस्कों के विषमलैंगिक रिश्ते पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए?’

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कोर्ट ने कहा, ‘केवल इस वजह से कि याचिकाकर्ता एक अंतरधार्मिक संबंध में रह रहे हैं, उन्हें भारतीय संविधान से मिले उनके मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता. जाति, पंथ, लिंग या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता.’ कोर्ट ने आगे कहा कि अपनी पसंद के साथी के साथ रहने का एक वयस्क का फैसला संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के भीतर आता है. इसमें साथी चुनने की स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने याचिकाओं का विरोध किया. सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि धर्मांतरण विरोधी कानून की धारा 8 और 9 का पालन नहीं किया है, जिसके तहत धार्मिक धर्मांतरण के मामले में जिला मजिस्ट्रेट को पूर्व घोषणा देना जरूरी है।

सरकार का कहना था कि यह घोषणा केवल विवाह तक सीमित नहीं है, बल्कि विवाह जैसे संबंधों में भी करनी होती है.कोर्ट की ओर से नियुक्त न्यायमित्र ने तर्क दिया कि अधिनियम के प्रावधान तभी लागू होंगे जब कोई व्यक्ति अपना धर्म परिवर्तन करने का इरादा रखता हो.दोनों पक्षों को सुनने के बाद, हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि कोई धर्मांतरण हुआ है या कोशिश की गई है।

 

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