ShivlingOrigin : ब्रह्मांड का सबसे पहला शिवलिंग कहां और किस रूप में प्रकट हुआ था? :- शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग का अर्थ है – अनंत, अर्थात जिसकी न तो कोई शुरुआत हो और न ही कोई अंत। शिवलिंग भगवान शिव और माता पार्वती के आदि-अनादि एकल रुप है। कई ऐसे शिवलिंग भी हैं, जो स्वयंभू’ माने जाते हैं, यानी वह किसी के द्वारा बनाए नहीं गए, बल्कि अपने आप प्रकट हुए हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि प्रथम शिवलिंग कहां और कैसे स्थापित हुआ था।
कैसे शुरू हुई शिवलिंग पूजा
लिंग महापुराण के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। तब उनके मध्य भगवान शिव एक विशाल, अंतहीन ‘ज्योतिर्लिंग’ के रूप में प्रकट हुए।
भगवान शिव ने ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु से कहा कि आप दोनों में से जो भी इस ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत खोज लेगा, वही श्रेष्ठ कहलाएगा। अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के इसके लिए विष्णु जी वाराह का रूप धारण करके ब्रह्मांड की गहराई में उतर गए।
वहीं ब्रह्मा जी हंस का रूप धारण ज्योतिर्लिंग का ऊपरी सिरा खोजने के लिए आकाश की ओर चल दिए। बहुत प्रयासों के बाद भी विष्णु भगवान और ब्रह्मा जी को शिवलिंग का छोर नहीं मिला।
तब उन्हें यह समझ आया कि इस दिव्य ज्योतिर्लिंग का अंत और आदि ढूंढना असंभव है। उन्होंने इस दिव्य ज्योतिर्लिंग में से आ रही ओम की ध्वनि की आराधना शुरू कर दी। तभी से महादेव को शिवलिंग रूप में पूजे जाने की परम्परा शुरू हुई।
दुनिया के प्रथम शिवलिंग को लेकर कई मान्यताएं मौजूद हैं। लेकिन लिंग महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार, देवभूमि उत्तराखंड में ‘लाखामंडल शिव मंदिर’ में स्थापित वह प्रथम शिवलिंग है, जिसके जरिए ब्रह्मा जी और विष्णु भगवान को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।
कहा जाता है कि इस लिंग के स्थापित होने के बाद स्वयं भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी ने इस शिवलिंग की पूजा की थी। मंदिर में मौजूद इस शिवलिंग को महामुंडेश्वर के नाम से जाना जाता है।
