ParmarthNiketan : पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पहुंचे परमार्थ :- परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश के पावन गंगा तट पर भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ एवं उनकी धर्मपत्नी सुदेश धनखड़ ने परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती के सान्निध्य में माँ गंगा की दिव्य आरती में सहभाग किया। इस अवसर पर विश्वशांति, मानवता के कल्याण, राष्ट्र की समृद्धि एवं सभी के सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना की गई।
परमार्थ निकेतन की विश्व प्रसिद्ध गंगा आरती प्रतिदिन माँ गंगा के पावन तट पर प्रार्थना, श्रद्धा और समर्पण के साथ आयोजित होती है। आरती में विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति ने इस आध्यात्मिक अवसर को और भी विशेष बना दिया। वैदिक मंत्रोच्चार, भजन, दीपों की दिव्य ज्योति और माँ गंगा की आरती से पूरा गंगा तट भक्तिमय हो उठा।
इस अवसर पर परमार्थ पीठाधीश्वर स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत की संस्कृति सबको स्वीकार करने की संस्कृति है। भारतीय संस्कृति ‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’ की संस्कृति है, अर्थात् चारों दिशाओं से कल्याणकारी विचार हमारे जीवन में आएँ।
यह संस्कृति केवल अपने लिए जीने की नहीं, बल्कि ‘जियो और जीने दो’ की संस्कृति है। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना के साथ सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का संदेश देती है।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी संस्कृति के इन जीवन-मूल्यों को अपने आचरण में उतारें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने परमार्थ निकेतन में अपने आध्यात्मिक अनुभव को साझा करते हुए कहा कि स्वामी जी का सान्निध्य व्यक्ति के भीतर गुरुतत्त्व की भावना को जागृत करता है।
उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन में बिताए कुछ क्षणों ने ही उन्हें गहन आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान की। उन्होंने बताया कि वे अपने कक्ष में स्वामी जी का सद्साहित्य पढ़ रहे थे, जिसमें भारतीय संस्कृति का सम्पूर्ण सार समाहित है।
धनखड़ जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति हमें ज्ञान प्रदान करती है और यह ज्ञान सदैव हमारे चित्त में रहना चाहिए। हमारे वेद, पुराण और उपनिषद् ज्ञान के भंडार हैं।
आज सम्पूर्ण मानव समाज किसी न किसी रूप में अनेक चुनौतियों और समस्याओं से जूझ रहा है। इन समस्याओं का समाधान भारतीय संस्कृति के जीवन-मूल्यों में निहित है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रसेवा सरल नहीं है; इसमें अनेक कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु हमारा लक्ष्य अर्जुन की तरह स्पष्ट और एकाग्र होना चाहिए।
