VaishnoDevi : अनसुलझे हैं वैष्णो देवी की गुफा का रहस्य :- जम्मू-कश्मीर के कटरा में त्रिकुटा पर्वत पर स्थित माता वैष्णो देवी का धाम देश के प्रमुख शक्तिपीठों और धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. मान्यता है कि माता वैष्णो देवी महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी की संयुक्त शक्ति का स्वरूप हैं. भवन की पवित्र गुफा में तीन प्राकृतिक पिंडियां मौजूद हैं, जिन्हें इन्हीं तीनों देवियों का प्रतीक माना जाता है. इन्हीं तीन शक्तियों के संयुक्त स्वरूप को माता वैष्णो देवी के रूप में पूजा जाता है. माता के इस पवित्र धाम से कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं. इनमें पंडित श्रीधर, माता वैष्णवी और भैरवनाथ से जुड़ी कथा सबसे ज्यादा प्रचलित है।
पंडित श्रीधर के भंडारे में पहुंची थीं माता
मान्यता के अनुसार, पंडित श्रीधर कटरा के पास हंसली गांव में रहते थे. वे धार्मिक प्रवृत्ति के और बेहद सरल स्वभाव के व्यक्ति थे. उनकी कोई संतान नहीं थी, जिसके कारण वे मन ही मन काफी दुखी रहते थे. एक बार पंडित श्रीधर ने गांव के लोगों के लिए भंडारा आयोजित करने का फैसला किया. उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार भोजन की व्यवस्था की, लेकिन मेहमानों की संख्या को देखते हुए उन्हें चिंता होने लगी कि इतने लोगों का भोजन कैसे तैयार होगा. भंडारे से पहले की रात वे इसी चिंता में परेशान रहे।
अगले दिन पूजा के दौरान एक सुंदर और तेजस्वी कन्या उनके पास पहुंची. मान्यता है कि उस कन्या का नाम वैष्णवी था. उसने भंडारे की पूरी व्यवस्था संभाल ली और देखते ही देखते सभी लोगों को भोजन करा दिया. भंडारा सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद वह कन्या अचानक वहां से गायब हो गई।
सपने में मिला पवित्र गुफा का संकेत
कहा जाता है कि कुछ समय बाद वही कन्या पंडित श्रीधर के सपने में दिखाई दी. उसने उन्हें एक पवित्र गुफा के बारे में बताया और संतान प्राप्ति का आशीर्वाद दिया. इसके बाद पंडित श्रीधर को एहसास हुआ कि भंडारे में आई कन्या कोई साधारण बालिका नहीं, बल्कि माता वैष्णो देवी का ही स्वरूप थीं. मान्यता है कि इसके बाद पंडित श्रीधर ने उस पवित्र गुफा की खोज की. तभी से इस स्थान पर माता वैष्णो देवी की पूजा और दर्शन की परंपरा आगे बढ़ती गई ।
भैरवनाथ ने किया माता वैष्णवी का पीछा
माता वैष्णो देवी की कथा में भैरवनाथ का प्रसंग भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता के अनुसार, पंडित श्रीधर के भंडारे में गुरु गोरखनाथ और उनके शिष्य भैरवनाथ भी पहुंचे थे. जब वैष्णवी ने भैरवनाथ को भोजन परोसा तो उन्होंने मांसाहारी भोजन की मांग की. वैष्णवी ने बताया कि यह ब्राह्मण के घर का भंडारा है, इसलिए यहां केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन ही उपलब्ध है. लेकिन भैरवनाथ अपनी मांग पर अड़े रहे और उन्होंने वैष्णवी को पकड़ने का प्रयास किया. इसके बाद वैष्णवी वहां से निकलकर त्रिकुटा पर्वत की ओर चली गईं और भैरवनाथ भी उनका पीछा करने लगे।
माता ने प्रकट की बाणगंगा
मान्यता है कि त्रिकुटा पर्वत की ओर जाते समय माता वैष्णो देवी के साथ हनुमान जी भी थे. यात्रा के दौरान जब हनुमान जी को प्यास लगी तो माता ने अपने धनुष से धरती पर बाण चलाया. इसके बाद वहां जलधारा प्रकट हुई. कहा जाता है कि माता ने इसी जलधारा में अपने केश धोए थे. इसी कारण इस स्थान को बाणगंगा कहा जाता है. श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि बाणगंगा में स्नान करने से मन की शुद्धि होती है और तीर्थ यात्रा की पवित्रता बढ़ती है।
अर्धकुंवारी गुफा में माता ने की तपस्या
बाणगंगा के बाद माता वैष्णो देवी एक गुफा में चली गईं और वहां तपस्या करने लगीं. मान्यता है कि इस दौरान हनुमान जी गुफा के बाहर रहकर माता की रक्षा कर रहे थे. पीछा करते हुए भैरवनाथ यहां भी पहुंच गए. कहा जाता है कि एक साधु ने भैरवनाथ को समझाया कि जिस कन्या का वे पीछा कर रहे हैं, वह कोई साधारण बालिका नहीं बल्कि देवी का स्वरूप हैं. हालांकि, भैरवनाथ ने साधु की बात नहीं मानी. इसके बाद माता गुफा से दूसरे रास्ते से बाहर निकलीं. इस स्थान को अर्धकुंवारी या अर्धकुमारी के नाम से जाना जाता है।
माता ने धारण किया दिव्य स्वरूप
अर्धकुंवारी से आगे बढ़ने के बाद माता वैष्णो देवी ने अपना दिव्य स्वरूप धारण किया और भैरवनाथ को वापस लौट जाने के लिए कहा. लेकिन भैरवनाथ ने उनका पीछा करना जारी रखा. मान्यता है कि इसके बाद माता फिर गुफा के भीतर चली गईं. इसी दौरान हनुमान जी और भैरवनाथ के बीच युद्ध हुआ. जब यह संघर्ष लंबा खिंचने लगा तो माता वैष्णो देवी स्वयं बाहर आईं और उन्होंने भैरवनाथ का वध कर दिया. कहा जाता है कि भैरवनाथ का सिर जिस स्थान पर जाकर गिरा, वह आज भैरव घाटी के नाम से प्रसिद्ध है. यहीं भैरवनाथ का मंदिर भी स्थित है।
भैरवनाथ को मिला माता का वरदान
भैरवनाथ को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने माता से क्षमा मांगी. मान्यता है कि माता वैष्णो देवी ने उन्हें क्षमा करते हुए वरदान दिया कि जो भक्त माता के दर्शन के लिए आएगा, उसकी तीर्थ यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाएगी, जब तक वह भैरवनाथ के दर्शन नहीं कर लेता. इसी मान्यता के कारण आज भी श्रद्धालु माता वैष्णो देवी के भवन में दर्शन करने के बाद भैरवनाथ मंदिर जाते हैं. इस तरह माता वैष्णो देवी की यात्रा केवल भवन में दर्शन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बाणगंगा, अर्धकुंवारी और भैरव घाटी जैसे पवित्र पड़ावों से होकर गुजरती है ।
