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Home » ChoptaBirdCrisis : चोपता में पक्षियों के प्रजनन पर क्यों मंडराया संकट
उत्तराखंड

ChoptaBirdCrisis : चोपता में पक्षियों के प्रजनन पर क्यों मंडराया संकट

Climate Change and Shrinking Boundaries.
Narad PostBy Narad PostJune 30, 2026Updated:June 30, 2026No Comments3 Mins Read
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ChoptaBirdCrisis
ChoptaBirdCrisis : चोपता में पक्षियों के प्रजनन पर क्यों मंडराया संकट
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ChoptaBirdCrisis : चोपता में पक्षियों के प्रजनन पर क्यों मंडराया संकट :-  हिमालय की गोद में स्थित ‘तृतीय केदार’ भगवान तुंगनाथ का पवित्र धाम और उसके चारों ओर मखमली चादर की तरह फैले चोपता के बुग्याल इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े पर्यावरणीय संकट से जूझ रहे हैं।

आस्था, ट्रेकिंग और प्राकृतिक सुंदरता के नाम पर हर साल यहाँ पहुँचने वाले लाखों सैलानियों की बेकाबू भीड़ और उनकी लापरवाही ने इस संवेदनशील इको-सिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) को बर्बादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है।

जिसे कभी उत्तराखंड का स्विट्जरलैंड कहा जाता था, वह खूबसूरत इलाका अब प्लास्टिक कचरे, गंदे पानी के रिसाव और शोर-शराबे का डंपिंग ग्राउंड बनता जा रहा है।

सैलानियों की बढ़ती तादाद के कारण चोपता घाटी की प्राकृतिक सुंदरता तेजी से फीकी पड़ रही है। स्थानीय स्तर पर पर्यटकों की सुविधा के लिए बनाए गए नीले टेंट वाले अस्थायी शौचालयों की गंदगी और मानव मल सीधे इन मखमली घास के मैदानों में रिस रहा है।

इसके साथ ही चाय की दुकानों और रास्तों पर बिखरे प्लास्टिक रैपर्स ने पूरे परिदृश्य को बिगाड़ दिया है। इस गंदगी और केमिकल युक्त रिसाव के कारण चोपता के सदियों पुराने प्राकृतिक जल स्रोत (धारे) अब दूषित हो चले हैं।

नेचर और बर्ड फोटोग्राफर राजू पुसोला ने इस इलाके में एक बेहद चिंताजनक दृश्य साझा किया। उन्होंने बारिश के दौरान उत्तराखंड के राज्य पक्षी ‘हिमालयन मोनाल’ को जमीन पर पड़े पैकेट से ‘कुरकुरे’ खाते हुए देखा। इंसानी प्रोसेस्ड फूड और प्लास्टिक का यह जहर इन दुर्लभ पक्षियों की प्रजनन क्षमता को सीधे तौर पर नष्ट कर रहा है।

इसके अलावा, सालाना आने वाले 5 से 6 लाख पर्यटकों का चरम दौर ठीक उसी समय होता है, जब इन पक्षियों का प्रजनन काल चल रहा होता है। सैलानियों द्वारा फूल तोड़ने और रास्तों को छोड़कर मुलायम घास को कुचलने से पौधों और जीवों का प्राकृतिक जीवन चक्र पूरी तरह बाधित हो गया है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद कुमार और राजीव लोचन द्वारा तुंगनाथ और मदमहेश्वर घाटी में मोनाल पक्षियों पर किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं:

कम्युनिकेशन में रुकावट: चोपता घाटी में वाहनों का शोर, पर्यटकों का हुड़दंग और आसमान में गूंजती हेलीकॉप्टरों की आवाज इन पक्षियों के आपसी संवाद को रोक देती है।

बढ़ रहा है तनाव: अपने साथी (Mate) को आकर्षित करने के लिए मोनाल को शोर के बीच बहुत तेज आवाज लगानी पड़ती है, जिससे उनकी ऊर्जा और सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।

अंडों पर खतरा: इस मानसिक तनाव और शोर के कारण मोनाल पक्षियों के अंडे देने और उन्हें सेने (Incubation) का जैविक समय पूरी तरह गड़बड़ा गया है, जिसके कारण उनके चूजों के जिंदा बचने की दर लगातार घट रही है।

जलवायु परिवर्तन और सिमटती सीमाएं

स्थानीय पुरोहित रेवाधर मैथानी और पर्यावरणविदों का कहना है कि पिछले 10 वर्षों में यहाँ के जंगलों और घास के मैदानों को अपूरणीय क्षति हुई है। पूरे साल चोपता में व्यावसायिक कैंपिंग गतिविधियों को बढ़ावा देने से स्थानीय तापमान प्रभावित हो रहा है। तेज हवाओं के कारण प्लास्टिक का जहर मिट्टी के पोषक तत्वों को बदल रहा है।

ग्लोबल वार्मिंग और ग्लेशियरों के पीछे खिसकने के कारण बुग्याल और पेड़ों की प्राकृतिक सीमाएं अब और अधिक ऊंचाई की तरफ खिसकने को मजबूर हैं।

यदि समय रहते इस अनियंत्रित पर्यटन पर लगाम नहीं लगाई गई और चोपता वन्यजीव अभयारण्य के कड़े नियमों को लागू नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में हिमालयन मोनाल, थार और रेड फॉक्स जैसी अनमोल प्रजातियां सिर्फ किताबों तक ही सीमित रह जाएंगी।

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